बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव में : सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर ‘शह-मात का खेल’ जारी है

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बिहार विधानसभा चुनाव: सीटों पर शह-मात का खेल, नेतृत्व पर संशय बरकरार :-

बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के मुखिया चिराग पासवान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल (यूनाइटेड) के बीच सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर ‘शह-मात का खेल’ जारी है। यह तनाव कई बिंदुओं पर आधारित है:

1. चिराग पासवान के तेवर और 2020 का अनुभव:

सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान: चिराग पासवान ने हाल ही में सार्वजनिक मंचों से ऐलान किया है कि उनकी पार्टी बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी, और NDA को जिताने का काम करेगी। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि ‘एनडीए गठबंधन को मजबूती देने के लिए हर सीट पर चिराग पासवान बनकर चुनाव लड़ूंगा’। इस बयान को उनकी बारगेन पावर बढ़ाने और जदयू पर दबाव बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

2020 का ‘बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट’ मॉडल:  2020 के विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी (तब अविभाजित लोजपा) NDA से अलग होकर चुनाव लड़ी थी और जदयू के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे। इससे जदयू को भारी नुकसान हुआ था और उसकी सीटें कम हो गई थीं। जदयू का आरोप है कि यह ‘चिराग मॉडल’ नीतीश कुमार को कमजोर करने के लिए बनाया गया था। इस बार भी चिराग के ‘बागी’ तेवर को नीतीश के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

पसंदीदा सीटों पर अड़चन:  चिराग पासवान उन 9 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहते हैं, जहां उनकी पार्टी 2020 में दूसरे नंबर पर रही थी। लेकिन इन सीटों पर जदयू भी अपने प्रत्याशी उतारना चाहती है, जिससे गतिरोध बना हुआ है।

2. मुख्यमंत्री पद की दावेदारी और नेतृत्व:

नीतीश कुमार का चेहरा: हालांकि चिराग पासवान ने सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार को NDA का मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किया है, लेकिन उनके लगातार बदलते बयान और ‘सभी सीटों पर लड़ने’ का ऐलान नीतीश कुमार और जदयू को असहज कर रहा है।

चिराग की सीएम महत्वाकांक्षा: सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि चिराग पासवान खुद को बिहार के मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, खासकर भविष्य के लिए। हालांकि, एनडीए के अंदर 2025 में उन्हें सीएम उम्मीदवार के रूप में स्वीकृति मिलना मुश्किल है, क्योंकि जदयू नीतीश को नहीं छोड़ेगी और भाजपा भी अपनी दावेदारी पेश कर सकती है।

युवा नेतृत्व की दौड़: तेजस्वी यादव (राजद) के साथ-साथ चिराग पासवान भी खुद को बिहार में एक युवा, करिश्माई और साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जो दलित और गैर-यादव पिछड़े वर्गों में लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। इससे नीतीश कुमार के लिए चुनौती बढ़ रही है।

3. भाजपा की भूमिका:

संतुलन साधना: भाजपा के लिए चिराग पासवान और नीतीश कुमार दोनों ही महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। भाजपा कोशिश कर रही है कि गठबंधन के भीतर कोई बड़ा टकराव न हो और सभी घटक दल मिलकर चुनाव लड़ें।

चिराग को समर्थन?: कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिराग पासवान के आक्रामक तेवर के पीछे कहीं न कहीं भाजपा का भी हाथ हो सकता है, जो नीतीश कुमार पर दबाव बनाने और सीट बंटवारे में अपनी बात मनवाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। चिराग खुद को प्रधानमंत्री मोदी का ‘हनुमान’ बताते हैं, जिससे भाजपा के साथ उनके संबंधों की गहराई का पता चलता है।

4. सीट बंटवारे का पेच:

 लोकसभा चुनाव 2024 में NDA ने बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया था। अब विधानसभा चुनाव 2025 में सीटों का बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती होगा। हर घटक दल, खासकर जदयू, लोजपा (रामविलास) और भाजपा, अधिक से अधिक सीटें मांगेंगे। चिराग का 243 सीटों का बयान इसी मोलभाव का हिस्सा है।

             कुल मिलाकर, बिहार में NDA के भीतर चिराग पासवान और नीतीश कुमार के बीच खींचतान सीटों के बंटवारे, नेतृत्व की भूमिका और भविष्य की राजनीतिक रणनीति को लेकर है। यह ‘शह-मात का खेल’ आगामी बिहार विधानसभा चुनावों तक जारी रहने की संभावना है, और भाजपा को इस गठबंधन को एकजुट रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

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