टाटा स्टील की बायोचार तकनीक से इस्पात निर्माण में नया अध्याय, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी : कचरे से तैयार चारकोल, इस्पात के उत्पादन में कम होगा कार्बन उत्सर्जन

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कचरे से तैयार चारकोल, इस्पात के उत्पादन में कम होगा कार्बन उत्सर्जन :-

जलवायु परिवर्तन के सबसे अहम कारक कार्बन उत्सर्जन को कम करना एक बड़ा मुद्दा रहा है। इस दिशा में टाटा स्टील ने एक बड़ी सफलता अर्जित की है। कंपनी ने अपने जमशेदपुर और ओडिशा स्थित संयंत्रों में शहरी कचरा और बांस के बायोमास से तैयार बायोचार यानी एक प्रकार के चारकोल को इस्पात निर्माण में कोयले की जगह उपयोग करना शुरू किया है। इससे हर साल करीब 50 हजार टन कार्बन उत्सर्जन घटेगा। साथ ही वर्तमान समय में इन संयंत्रों में 30 हजार टन जीवाश्म ईंधन की खपत भी कम हो गई है।

इस तकनीक को अपना कर टाटा स्टील देश की पहली कंपनी बन गई है जो इस्पात उत्पादन में वैकल्पिक ईंधन के रूप में ब्रायोचार का इस्तेमाल कर रही है। देश की सबसे बड़ी इस्पात उत्पादक कंपनियों में शुमार टाटा स्टील लंबे समय से ग्रीन स्टील की दिशा में काम कर रही है। प्लांट में एक टन स्टील के उत्पादन में 2.30 टन कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन होता है। कंपनी ने वर्ष 2045 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में आरएंडडी टीम ने जनवरी 2023 से जमशेदपुर स्थित ब्लास्ट फर्नेस में बायोचार का सफल परीक्षण शुरू किया। 3,000 घन मीटर और  १,००० टन प्रतिदिन क्षमता वाले फर्नेस में यह प्रयोग सफल रहा।

कार्बन उत्सर्जन में आई 40 प्रतिशत तक गिरावट :

इस तकनीक से प्रति टन इस्पात निर्माण के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन की काफी कमी अई है। वहीं फेरी एलाय मिनरल्स रिसर्च टीम ने एक वैकल्पिक विधि भी विकसित की है, जो सल्फर को रिडक्टेंट के रूप में इस्तेमाल करती है। कुल मिलाकर इस्पात के उत्पादन के दौरान 40 प्रतिशत तक कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन में कमी आई है।

ओडिशा के प्लांटों में भी मिली सफलताः

टाटा स्टील के जमशेदपुर के अलावा ओडिशा में कटक जिले के अधागढ़ में फेरो क्रोम प्लांट है। इसके अतिरिक्त कलिंगनगर में स्थित संयंत्र में भी कंपनी बायोचार और बायोमास का उपयोग कर रही है। कंपनी ने अब तक लगभग 30 हजार टन जीवाश्म ईंधन को बायोचार से बदला है। इससे संयंत्र में होने वाले कार्बन उत्सर्जन में 50 हजार टन से अधिक की सालाना कमी दर्ज की गई है जो कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। टाटा स्टील के जमशेदपुर प्लांट में प्रतिवर्ष एक करोड़ 10 लाख टन और कलिंगनगर प्लांट में 80 लाख टन स्टील का उत्पादन होता है।

कैसे बनता है यह बायो चारकोलः

बागां चारकोल बनाने के लिए शहरी कचरे और बांस के अवशेषों को पहले अलग किया जाता है। फिर उन्हें 500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर धर्मोकैटेलिटिक गैसीकरण प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इस प्रक्रिया से सिनगैस और बायो चारकोल तैयार होता है। इसी बायो चारकोल को बायोचार करा जाता है जिसे ब्लास्ट फर्नेस (एक प्रकार की भट्टी) में इंजेक्शन तकनीक के जरिए डाला जाता है। जो कोयले का विकल्प बनता है।

कार्बन उत्सर्जन में भारी गिरावट :

इस नई तकनीक से प्रति टन इस्पात निर्माण में करीब तीन टन कार्बन उत्सर्जन की कमी हुई है। वहीं फेरो एलाय मिनरल्स रिसर्च टीम ने एक वैकल्पिक विधि भी विकसित की है, जो सल्फर को रिडक्टेंट के रूप में इस्तेमाल करती है। इससे कुल मिलाकर इस्पात के उत्पादन के दौरान 40 प्रतिशत तक कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन में कमी आई है।

राजीव मंगल, वाइस प्रेसिडेंट, सेफ्टी, हेल्थ एंड सस्टेनबिलिटी, टाटा स्टील -“टाटा स्टील ने कोयले जैसे कार्बन उत्सर्जक ईंधन के बदले बायोचार का इस्तेमाल शुरू किया है और हमें इसमें सफलता भी मिली है। यह पहल इस्पात निर्माण के क्षेत्र में वैकल्पिक ईंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।”

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