Lunar Eclipse: धार्मिक मान्यता है कि पितृ लोक से हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध से तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं। इस कारण पितृपक्ष में किए गए कर्मकांड न केवल पितरों की आत्मा को शांति देते हैं, बल्कि घर-परिवार में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं।
Chandra Grahan Effects On Shradh:
पितृपक्ष को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र समय माना गया है। यह सोलह दिन हमारे उन पूर्वजों की स्मृति और कृतज्ञता को समर्पित होते हैं, जिनकी वजह से आज हमारी जीवन यात्रा संभव है। धार्मिक मान्यता है कि पितृ लोक से हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध से तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं। इस कारण पितृपक्ष में किए गए कर्मकांड न केवल पितरों की आत्मा को शांति देते हैं, बल्कि घर-परिवार में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं।
इस वर्ष पितृपक्ष की विशेषता और भी अनोखी मानी जा रही है क्योंकि इसकी शुरुआत और समापन दोनों ही दिन ग्रहण का साया रहेगा। यह संयोग काफी दुर्लभ माना जाता है। स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में प्रश्न उठ रहा है कि क्या ग्रहण का असर श्राद्ध और तर्पण जैसे धार्मिक कार्यों पर पड़ेगा? क्या इससे पूजा-पाठ में किसी प्रकार की बाधा आएगी या फिर ग्रहणकाल के बाद शुभ मुहूर्त में इन कर्मकांडों को करना उतना ही फलदायी रहेगा जितना सदियों से परंपरा में होता आया है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि ग्रहण की अवधि में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और पितृपक्ष में श्राद्ध पूजा के कौन से समय को सबसे शुभ माना जाएगा। इसी के साथ हम यह भी समझेंगे कि पितृपक्ष में सही रीति-नीति से किए गए कर्मकांड किस प्रकार परिवार पर पितरों का आशीर्वाद बनाए रखते हैं।
द्रिक पंचांग के अनुसार, पितृपक्ष की शुरुआत हर साल भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि से होती है। वर्ष 2025 में पूर्णिमा तिथि 7 सितंबर को पड़ रही है, जो रविवार के दिन होगी। इस दिन सुबह 01:41 बजे से पूर्णिमा तिथि आरंभ होगी और रात 11:38 बजे तक रहेगी। इसी के साथ पितृपक्ष की पवित्र अवधि का आरंभ होगा।
पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन होता है। इस बार अमावस्या तिथि 21 सितंबर 2025, रविवार को है। यह तिथि सुबह 12:16 बजे से शुरू होकर अगले दिन यानी 22 सितंबर की सुबह 01:23 बजे तक रहेगी। इसी दिन अंतिम श्राद्ध किया जाएगा, जिसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इस प्रकार 7 सितंबर से 21 सितंबर 2025 तक पितृपक्ष का यह पावन काल चलेगा।
साल 2025 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण 7 सितंबर की रात को लगने वाला है। यह ग्रहण रात 9 बजकर 58 मिनट से शुरू होगा और 8 सितंबर की सुबह 1 बजकर 26 मिनट तक चलेगा। यह कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में घटित होगा और भारत में दिखाई देगा। इसी कारण इसका सूतक काल मान्य होगा और इसका प्रभाव भी देश-दुनिया पर पड़ेगा।
इसके बाद 21 सितंबर 2025 की रात 10 बजकर 59 मिनट से 22 सितंबर की सुबह 3 बजकर 23 मिनट तक सूर्य ग्रहण रहेगा। हालांकि यह ग्रहण भारत में दृष्टिगोचर नहीं होगा, इसलिए इसका सूतक मान्य नहीं होगा और राशियों पर इसका कोई असर भी नहीं पड़ेगा।
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म विशेष मुहूर्त में करना श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध पूजा के लिए कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और अपराह्न काल को सबसे शुभ माना गया है। कोशिश करनी चाहिए कि अपराह्न काल समाप्त होने से पहले सभी श्राद्ध संबंधी अनुष्ठान पूरे कर लिए जाएँ, ताकि पितरों को पूर्ण संतुष्टि और आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
साल 2025 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण 7 सितंबर की रात को लगने वाला है। यह ग्रहण रात 9 बजकर 58 मिनट से शुरू होगा और 8 सितंबर की सुबह 1 बजकर 26 मिनट तक चलेगा। यह कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में घटित होगा और भारत में दिखाई देगा। इसी कारण इसका सूतक काल मान्य होगा और इसका प्रभाव भी देश-दुनिया पर पड़ेगा।
इसके बाद 21 सितंबर 2025 की रात 10 बजकर 59 मिनट से 22 सितंबर की सुबह 3 बजकर 23 मिनट तक सूर्य ग्रहण रहेगा। हालांकि यह ग्रहण भारत में दृष्टिगोचर नहीं होगा, इसलिए इसका सूतक मान्य नहीं होगा और राशियों पर इसका कोई असर भी नहीं पड़ेगा।




