तालिबान के विदेश मंत्री पहली बार भारत दौरे पर, चीन और पाकिस्तान में मची हलचल
नई दिल्ली। अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद पहली बार किसी वरिष्ठ अफगान अधिकारी ने भारत की यात्रा की है। तालिबान सरकार के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी छह दिवसीय दौरे पर भारत पहुंचे हैं। यह यात्रा भारत-अफगानिस्तान संबंधों में नई कूटनीतिक शुरुआत के रूप में देखी जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, इस दौरे के दौरान अमीर खान मुत्ताकी भारत के विदेश मंत्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात करेंगे। चर्चाओं में व्यापार, सुरक्षा सहयोग, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहेंगे।
भारत-तालिबान संबंधों में नई दिशा
भारत ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है, लेकिन काबुल में अपने राजनयिक संपर्क बनाए रखे हैं। बीते एक वर्ष में भारत ने अफगानिस्तान को मानवीय सहायता, गेहूं, दवाइयां और कोविड-19 टीके भेजे हैं।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा भारत के लिए “संपर्क बनाए रखने की रणनीति” का हिस्सा है, ताकि क्षेत्र में अपना प्रभाव संतुलित रखा जा सके।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा,
“भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अफगानिस्तान दोबारा आतंकवाद का अड्डा न बने और वहां की सरकार भारत के हितों के खिलाफ न जाए।”
चीन और पाकिस्तान में चिंता
अमीर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा से चीन और पाकिस्तान दोनों देशों की बेचैनी बढ़ गई है। दोनों देश लंबे समय से अफगानिस्तान में अपने रणनीतिक हितों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेष रूप से पाकिस्तान, जिसने तालिबान के साथ दशकों तक करीबी संबंध रखे, भारत की इस सक्रियता को अपनी कूटनीतिक बढ़त के लिए खतरा मान रहा है।
वहीं चीन ने भी अफगानिस्तान में खनिज संसाधनों और निवेश को लेकर अपनी रुचि दिखाई है, लेकिन भारत की बढ़ती मौजूदगी उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है।
क्षेत्रीय कूटनीति में भारत की भूमिका
भारत का यह कदम दर्शाता है कि वह अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाना चाहता है। अफगानिस्तान में स्थिरता न केवल दक्षिण एशिया बल्कि पूरे मध्य एशिया की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है।
समाधान
अमीर खान मुत्ताकी की यह यात्रा भारत और अफगानिस्तान के बीच एक नई संवाद प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती है। हालांकि भारत अभी भी तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने से बच रहा है, लेकिन यह स्पष्ट है कि नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक कूटनीति की दिशा में आगे बढ़ रही है।








