“कोल्ड्रिफ” कफ सिरप विवाद: बच्चों की मौत के बाद पश्चिम बंगाल में बिक्री पर प्रतिबंध, WHO ने मांगा जवाब
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में कुछ बच्चों की संदिग्ध मौतों के बाद “कोल्ड्रिफ” कफ सिरप को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस दवा को कथित रूप से बच्चों की मौत से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसके चलते देशभर में हड़कंप मच गया है।
राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर इस मामले को गंभीरता से लिया गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने एहतियात के तौर पर इस कफ सिरप की बिक्री और उपयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने सभी अस्पतालों और दवा दुकानों को “कोल्ड्रिफ” सिरप का स्टॉक तुरंत जब्त करने के निर्देश दिए हैं।
WHO ने भारत से मांगा स्पष्टीकरण
इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत सरकार से इस कफ सिरप के निर्यात और उत्पादन को लेकर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा है। WHO ने कहा है कि यह जरूरी है कि दवा निर्माण प्रक्रिया, गुणवत्ता जांच और निर्यात मानकों की पूरी पारदर्शिता बनी रहे।
एक बयान में WHO ने कहा,
“हम भारत के औषधि नियामक अधिकारियों के संपर्क में हैं और उनसे कोल्ड्रिफ सिरप के नमूनों और जांच रिपोर्ट की विस्तृत जानकारी मांगी गई है।”
CDSCO ने शुरू की देशव्यापी जांच
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सभी राज्यों से कफ सिरप निर्माताओं की सूची और सैंपल रिपोर्ट मांगी है। इसके साथ ही, यह जांच की जा रही है कि क्या “कोल्ड्रिफ” के किसी अन्य बैच में भी हानिकारक रासायनिक तत्व मौजूद हैं।
सूत्रों के अनुसार, प्रयोगशाला परीक्षणों में कुछ बैचों में डायथिलीन ग्लाइकॉल (Diethylene Glycol) की उपस्थिति का संदेह जताया गया है — यह वही रासायनिक तत्व है, जिसकी वजह से पहले भी कई देशों में दवा-जनित मौतें हुई थीं।
फार्मा कंपनियों पर बढ़ा दबाव
भारत का फार्मा उद्योग दुनिया में एक बड़ा निर्यातक माना जाता है। लेकिन हाल के महीनों में कुछ दवाओं पर सवाल उठने से उद्योग की अंतरराष्ट्रीय साख को झटका लगा है। अब सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि किसी भी उत्पाद के कारण भारत की दवा गुणवत्ता पर सवाल न उठे।
निष्कर्ष
“कोल्ड्रिफ” सिरप विवाद ने देश के स्वास्थ्य नियामक तंत्र और फार्मा उद्योग की विश्वसनीयता को चुनौती दी है। सरकार और WHO दोनों इस मामले की गहराई से जांच कर रहे हैं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
यह मामला न केवल बच्चों की सुरक्षा बल्कि भारत की दवा निर्माण प्रक्रिया में गुणवत्ता और जवाबदेही के सवाल को भी सामने लाता है।








