महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद में रार: क्या दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व हो जाएगा कम?
संसद का विशेष सत्र इन दिनों अखाड़ा बना हुआ है। केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 और परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill 2026) ने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। मुद्दा केवल महिलाओं को 33% आरक्षण देने का नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़े ‘परिसीमन’ के पेंच ने विपक्षी दलों, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों को चिंता में डाल दिया है।
विवाद की मुख्य जड़: उत्तर बनाम दक्षिण भारत
विपक्षी दलों का आरोप है कि जनसंख्या के आधार पर होने वाला परिसीमन “हिंदी बेल्ट” (उत्तर भारत) को फायदा पहुँचाएगा। केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का तर्क है कि उन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण के लिए बेहतर काम किया, लेकिन अब उन्हें इसकी सजा कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व (कम लोक सभा सीटों) के रूप में मिल सकती है।
प्रमुख चिंताएं:
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सीटों का असंतुलन: नए प्रस्ताव के अनुसार लोक सभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 तक की जा सकती है।
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उत्तर भारत का दबदबा: जनसंख्या वृद्धि के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें काफी बढ़ जाएंगी, जिससे केंद्र की सत्ता में उनका प्रभाव और अधिक बढ़ जाएगा।
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दक्षिण की आवाज: केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों की हिस्सेदारी कुल प्रतिशत में कम होने की आशंका है।
सरकार का पक्ष: “किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा”
हंगामे के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने सदन को आश्वस्त किया है कि परिसीमन की प्रक्रिया पारदर्शी होगी और किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि 33% महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सीटों का विस्तार संवैधानिक आवश्यकता है।
“हम यह सुनिश्चित करेंगे कि लोक सभा की कुल ताकत बढ़ने के बावजूद राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का अनुपात संतुलित रहे।” – अमित शाह (सदन में संबोधन)







