अफगान विदेश मंत्री भारत दौरे पर, तालिबान से राजनयिक संबंधों पर टिकी निगाहें

अफगान विदेश मंत्री भारत दौरे पर, तालिबान से राजनयिक संबंधों पर टिकी निगाहें
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🌍 भारत पहुंचे अफगान विदेश मंत्री

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी सोमवार को सात दिवसीय भारत यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत और तालिबान के बीच संबंधों को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा तेज है। मुत्ताकी की यह पहली आधिकारिक भारत यात्रा है, जिसे कूटनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।

मुत्ताकी के साथ अफगान विदेश मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, अफगान प्रतिनिधिमंडल की भारत यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग, मानवीय सहायता और सुरक्षा साझेदारी को मजबूत करना है।


🇮🇳 भारत और तालिबान के बीच संवाद की नई पहल

भारत ने 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था। हालांकि, 2022 में भारत ने एक “तकनीकी मिशन” के रूप में सीमित राजनयिक उपस्थिति बहाल की थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि मुत्ताकी की यह यात्रा भारत और तालिबान के बीच राजनयिक विश्वास बहाली का संकेत है। भारत अब सीधे तालिबान के नेताओं से संवाद कर रहा है ताकि अपने रणनीतिक और मानवीय हितों की रक्षा कर सके।


🤝 संभावित मुद्दे: सुरक्षा, व्यापार और विकास

इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम विषयों पर चर्चा की संभावना है —

  1. सुरक्षा सहयोग: भारत चिंतित है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल किसी आतंकी नेटवर्क द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों के लिए न किया जाए। इस विषय पर सीधी बातचीत होने की उम्मीद है।
  2. मानवीय सहायता: भारत पहले ही अफगानिस्तान को 50,000 टन गेहूं, दवाइयाँ और कोरोना टीके भेज चुका है। मुत्ताकी इस सहायता के विस्तार पर चर्चा कर सकते हैं।
  3. आर्थिक सहयोग: अफगानिस्तान भारत से चाबहार पोर्ट और हवाई व्यापार गलियारे के माध्यम से निर्यात बढ़ाने का इच्छुक है।
  4. शिक्षा और विकास: कई अफगान छात्र भारत में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इस सहयोग को और मजबूत करने पर भी चर्चा की उम्मीद है।

💬 मुत्ताकी का बयान

भारत पहुंचने के बाद मुत्ताकी ने कहा कि “अफगानिस्तान भारत को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखता है। हमारा उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।” उन्होंने यह भी कहा कि अफगानिस्तान चाहता है कि भारत पुनर्निर्माण और शिक्षा परियोजनाओं में सक्रिय भूमिका निभाए।


🏛️ भारत की प्रतिक्रिया

भारत के विदेश मंत्रालय ने मुत्ताकी के आगमन का औपचारिक स्वागत किया। मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा,

“भारत हमेशा से एक स्थिर, शांतिपूर्ण और समावेशी अफगानिस्तान का समर्थक रहा है। हम मानवीय सहायता और क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर सार्थक संवाद जारी रखेंगे।”

हालांकि, भारत अब भी तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं देता है। यह दौरा भारत के “Engage without Recognize” (संवाद बिना मान्यता) नीति का हिस्सा माना जा रहा है।


🕊️ क्षेत्रीय स्थिरता पर असर

अफगानिस्तान की स्थिति का प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ता है। पाकिस्तान, ईरान, चीन और रूस पहले से ही तालिबान से सीधे संपर्क में हैं। ऐसे में भारत की यह सक्रियता भू-राजनीतिक संतुलन के लिए अहम है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत यदि तालिबान के साथ संवाद बढ़ाता है, तो वह अफगानिस्तान में आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति दोबारा स्थापित कर सकता है — खासकर जब चीन वहां बड़े निवेश कर रहा है।


🧭 भारत की रणनीतिक सोच

भारत की अफगान नीति हमेशा “जन-केन्द्रित सहयोग” पर आधारित रही है। पिछले दो दशकों में भारत ने अफगानिस्तान में ₹22,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाएं पूरी की हैं — जिनमें सलमा डैम, अफगान संसद भवन और जोराबाद सड़क परियोजना शामिल हैं।

तालिबान शासन में ये परियोजनाएं ठप पड़ी थीं। मुत्ताकी की यात्रा के दौरान इन योजनाओं के पुनरारंभ पर भी चर्चा हो सकती है।


⚖️ अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

अमेरिका और यूरोपीय संघ भारत की इस पहल पर नजर रखे हुए हैं। वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि “भारत दक्षिण एशिया में तालिबान से ‘Constructive Engagement’ की नीति अपना रहा है।”

वहीं रूस और ईरान पहले से ही तालिबान के साथ राजनयिक संबंध बनाए हुए हैं। ऐसे में भारत की यह यात्रा कूटनीतिक स्पेस बढ़ाने की दिशा में एक कदम मानी जा रही है।


📊 विशेषज्ञों की राय

विदेश नीति विश्लेषक प्रो. संजय भारद्वाज कहते हैं —

“भारत का रुख व्यावहारिक है। तालिबान के साथ संवाद से भारत अपने नागरिकों, परियोजनाओं और क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।”

दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस प्रक्रिया में सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि तालिबान की नीतियाँ अभी भी महिलाओं के अधिकारों और लोकतंत्र से मेल नहीं खातीं।


🌐 आगे की राह

मुत्ताकी की यात्रा के दौरान भारत और अफगानिस्तान के बीच कई अनौपचारिक बैठकों और ट्रैक-2 संवादों की भी योजना है। यदि सबकुछ सकारात्मक रहा, तो आने वाले महीनों में भारत काबुल में स्थायी राजनयिक मिशन फिर से खोल सकता है।

यह यात्रा निश्चित रूप से दक्षिण एशिया की राजनयिक दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है।


🧩 समाधान

अफगान विदेश मंत्री मुत्ताकी की भारत यात्रा एक नई कूटनीतिक शुरुआत का संकेत देती है। भले ही भारत ने अभी तालिबान को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन संवाद की यह पहल भविष्य में भारत-अफगान संबंधों के पुनर्निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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