आवारा कुत्तों के आतंक पर सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई — देशभर में बढ़ती घटनाओं पर उठे सवाल

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सुप्रीम कोर्ट में आज आवारा कुत्तों के आतंक पर अहम सुनवाई

देशभर में बढ़ती आवारा कुत्तों से जुड़ी घटनाओं ने एक बार फिर बहस को जन्म दिया है। इन घटनाओं के चलते आज सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है।
अदालत उन याचिकाओं पर विचार करेगी, जिनमें देशभर में आवारा कुत्तों के प्रबंधन, नसबंदी, और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है।


क्या है मामला?

पिछले कुछ महीनों में देश के कई राज्यों — खासकर केरल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और तेलंगाना — में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएँ सामने आई हैं।
इन घटनाओं में कई बच्चों और बुजुर्गों को गंभीर चोटें आई हैं, जबकि कुछ मामलों में मौतें भी हुई हैं।

इन घटनाओं के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों, नागरिक समूहों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।


याचिकाओं में क्या मांगा गया है?

याचिकाओं में मांग की गई है कि —

  1. देशभर में एक समान नीति बनाई जाए जिससे आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर नियंत्रण पाया जा सके।
  2. नगर निगमों और स्थानीय निकायों को नसबंदी (Animal Birth Control) और टीकाकरण अभियान तेज करने के निर्देश दिए जाएँ।
  3. उन इलाकों में जहाँ हमलों की घटनाएँ अधिक हैं, वहाँ विशेष सुरक्षा उपाय किए जाएँ।
  4. जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकारी अभियान चलाए जाएँ।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी जताई थी चिंता

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई की हो।
2023 और 2024 में भी अदालत ने राज्यों को चेतावनी दी थी कि —

“मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन पशु अधिकारों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।”

अदालत ने तब कहा था कि हर राज्य को अपने क्षेत्र में Animal Birth Control Rules, 2023 के तहत प्रभावी कदम उठाने होंगे।


क्या कहती हैं वर्तमान गाइडलाइंस?

Animal Birth Control (ABC) Rules, 2023 के तहत —

  • आवारा कुत्तों को पकड़ा जा सकता है,
  • नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ा जाना चाहिए,
  • किसी भी हालत में उन्हें मारने या हटाने की अनुमति नहीं है।

लेकिन इन नियमों के लागू होने में जमीनी स्तर पर कई कमियाँ पाई गई हैं —

  • नगर निगमों के पास संसाधनों की कमी,
  • पर्याप्त पशु चिकित्सक और सेंटरों का अभाव,
  • बढ़ती जनसंख्या के चलते कुत्तों की संख्या पर नियंत्रण नहीं।

जनता की चिंता

देशभर के कई हिस्सों में लोगों में डर का माहौल है।

  • स्कूलों के पास, पार्कों और कॉलोनियों में आवारा कुत्तों की झुंड में उपस्थिति से बच्चों की सुरक्षा पर खतरा है।
  • कई नगरों में स्थानीय निवासियों ने विरोध प्रदर्शन भी किए हैं।
  • वहीं पशु अधिकार संगठन मानवीय व्यवहार की अपील कर रहे हैं।

एक निवासी का कहना है —

“हर दिन बच्चों को स्कूल भेजते हुए डर लगता है। नगर निगम सिर्फ बयान देता है, काम कुछ नहीं होता।”


पशु प्रेमियों की राय

पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि समस्या का समाधान हिंसा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।
वे सरकार से मांग कर रहे हैं कि —

  • “Dog adoption drives” बढ़ाई जाएँ,
  • नसबंदी को तेज किया जाए,
  • कुत्तों के लिए आश्रय स्थल (shelters) बनाए जाएँ।

सुप्रीम कोर्ट से क्या उम्मीदें हैं?

आज की सुनवाई में अदालत से उम्मीद की जा रही है कि —

  • राज्यों को एकीकृत नीति बनाने के निर्देश दिए जाएँगे,
  • केंद्र सरकार से स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी जाएगी,
  • और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए तात्कालिक कदम सुझाए जाएँगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई देशभर में मानव और पशु अधिकारों के संतुलन की नई रूपरेखा तय कर सकती है।


निष्कर्ष

आवारा कुत्तों का मुद्दा अब सिर्फ सामाजिक या प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी और मानवीय दृष्टिकोण से भी संवेदनशील बन चुका है।
सुप्रीम कोर्ट की आज की सुनवाई से उम्मीद की जा रही है कि एक ऐसा व्यवस्थित समाधान सामने आएगा जो न केवल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बल्कि पशुओं के अधिकारों का भी सम्मान करे।

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