नई दिल्ली, 5 सितंबर 2025 — कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी एक बार फिर से कानूनी विवाद में घिर गई हैं। दिल्ली की एक अदालत में उनके खिलाफ एक याचिका दायर की गई है जिसमें सवाल उठाया गया है कि आखिर भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से पहले उनका नाम भारत की वोटर लिस्ट में कैसे शामिल हो गया। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर 2025 तय की है। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है और एक बार फिर नागरिकता से जुड़े पुराने विवाद चर्चा का विषय बन गए हैं।
मामला क्या है?
याचिकाकर्ता ने अदालत में दावा किया है कि सोनिया गांधी का नाम उस समय वोटर लिस्ट में शामिल कर दिया गया था जब वे आधिकारिक रूप से भारतीय नागरिक नहीं बनी थीं। भारतीय संविधान और चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, केवल भारतीय नागरिक को ही मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का अधिकार है। ऐसे में यदि याचिका में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल कानूनी उल्लंघन होगा बल्कि एक बड़ा राजनीतिक विवाद भी बन सकता है।
सोनिया गांधी की नागरिकता पर पहले भी उठते रहे हैं सवाल
सोनिया गांधी का जन्म इटली में हुआ था और 1968 में उनकी शादी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से हुई थी। विवाह के बाद उन्होंने लंबे समय तक भारत में निवास किया और बाद में 1983 में भारतीय नागरिकता प्राप्त की।
हालांकि उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही विपक्षी दलों ने उनकी विदेशी पृष्ठभूमि और नागरिकता को मुद्दा बनाया। 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी सोनिया गांधी की नागरिकता पर जमकर राजनीति हुई थी और अब एक बार फिर वही विवाद उठ खड़ा हुआ है।
कानूनी पहलू क्या कहते हैं?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 यह स्पष्ट करता है कि केवल भारतीय नागरिक ही भारत में चुनावों में वोट देने के योग्य है। इसी आधार पर चुनाव आयोग मतदाता सूचियों को तैयार करता है। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह है, तो उसका नाम वोटर लिस्ट से हटाया जा सकता है।
इस मामले में अदालत को यह देखना होगा कि सोनिया गांधी का नाम किस वर्ष और किन दस्तावेज़ों के आधार पर वोटर लिस्ट में जोड़ा गया। यदि यह पाया गया कि नागरिकता लेने से पहले ही नाम शामिल कर दिया गया था, तो यह एक गंभीर चूक मानी जाएगी।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
इस याचिका के सामने आने के बाद से राजनीतिक हलकों में तेज़ हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने कांग्रेस पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा है कि यह मामला भारतीय लोकतंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि नैतिकता का सवाल भी है।
वहीं, कांग्रेस ने इस याचिका को राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया है। पार्टी का कहना है कि बार-बार सोनिया गांधी की नागरिकता को मुद्दा बनाना दरअसल विपक्ष की हताशा का परिणाम है।
इतिहास दोहराने की कोशिश?
यह पहला मौका नहीं है जब सोनिया गांधी की नागरिकता और वोटर लिस्ट से जुड़े विवाद सुर्खियों में आए हों। अतीत में भी कई बार यह मुद्दा उठाया गया है।
- 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्षी नेताओं ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य होने पर सवाल उठाए थे।
- 2004 में जब कांग्रेस ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाया, तब भी विपक्ष ने उनकी विदेशी पृष्ठभूमि को लेकर कड़ा विरोध किया।
अब 2025 में एक बार फिर यह विवाद सामने आ गया है, जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
10 सितंबर की सुनवाई पर सबकी नज़रें
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 10 सितंबर तय की है। इस दिन यह साफ़ होगा कि अदालत इस याचिका को किस दिशा में आगे बढ़ाती है।
यदि अदालत ने इस मामले में जांच के आदेश दिए, तो यह कांग्रेस और सोनिया गांधी दोनों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। वहीं अगर अदालत ने आरोपों को आधारहीन बताया, तो कांग्रेस इसे अपने लिए राजनीतिक विजय के रूप में पेश करेगी।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों में सबूतों का महत्व सबसे अधिक होता है। अदालत यह देखेगी कि
- सोनिया गांधी का नाम किस वर्ष वोटर लिस्ट में शामिल किया गया था।
- उस समय वे भारतीय नागरिक थीं या नहीं।
- क्या चुनाव आयोग से कोई चूक हुई या यह जानबूझकर किया गया कदम था।
यदि याचिकाकर्ता अपने आरोपों को दस्तावेज़ी सबूतों से साबित नहीं कर पाए, तो मामला ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाएगा।
कांग्रेस के लिए चुनौती
कांग्रेस पहले से ही कई राजनीतिक और संगठनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। पार्टी को हाल के चुनावों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। ऐसे में सोनिया गांधी के खिलाफ यह याचिका पार्टी की छवि पर असर डाल सकती है।
कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा है कि यह एक “दुहराई जाने वाली साज़िश” है और अदालत में सच सामने आ जाएगा।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर भी यह मामला चर्चा में है। ट्विटर (X), फेसबुक और व्हाट्सएप पर लोग इसे लेकर तरह-तरह की राय जता रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक नौटंकी है, जबकि कुछ का मानना है कि यदि आरोप सही हैं तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
सोनिया गांधी के खिलाफ दायर यह याचिका केवल एक कानूनी मामला नहीं बल्कि भारतीय राजनीति का संवेदनशील मुद्दा भी बन चुका है। इससे न केवल कांग्रेस बल्कि पूरे विपक्ष और सत्ता पक्ष की रणनीति प्रभावित हो सकती है।
अब सबकी नज़रें 10 सितंबर पर टिकी हैं, जब अदालत इस मामले की सुनवाई करेगी और यह तय होगा कि यह विवाद आगे बढ़ेगा या यहीं खत्म हो जाएगा।




