भारत ने एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाते हुए चिनाब नदी पर 1856 मेगावाट की महत्वाकांक्षी सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। यह परियोजना न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण होगी, बल्कि इसे पाकिस्तान के लिए एक “बड़ा झटका” भी माना जा रहा है, खासकर सिंधु जल संधि के संदर्भ में।
क्या है सावलकोट परियोजना?
सावलकोट पनबिजली परियोजना जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर प्रस्तावित है। यह एक “रन-ऑफ-द-रिवर” परियोजना है, जिसका अर्थ है कि यह नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग करके बिजली पैदा करेगी। दशकों से लंबित इस परियोजना को अब केंद्र सरकार ने “राष्ट्रीय स्तर की आवश्यकता” मानते हुए गति प्रदान की है। नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) ने इसके लिए अंतरराष्ट्रीय टेंडर जारी कर दिए हैं।
सिंधु जल संधि और पाकिस्तान की चिंताएं
यह परियोजना सिंधु जल संधि के तहत आने वाली चिनाब नदी पर स्थित है। 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई इस संधि के तहत, चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों के पानी का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान को आवंटित है, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज का पानी भारत को मिलता है। पाकिस्तान लंबे समय से भारत द्वारा इन पश्चिमी नदियों पर किसी भी परियोजना का विरोध करता रहा है, यह तर्क देते हुए कि इससे उसे मिलने वाले पानी की मात्रा कम हो जाएगी।
पाकिस्तान पर संभावित प्रभाव
हालांकि सावलकोट एक रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना है, फिर भी पाकिस्तान को आशंका है कि इससे उसे मिलने वाले पानी के प्रवाह में कमी आ सकती है। यह आशंका उस समय और भी बढ़ गई है जब हाल ही में भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद “सिंधु जल संधि को अस्थायी रूप से निलंबित” करने का फैसला लिया था। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग करेगा और अब पाकिस्तान की आपत्तियां उसके विकास कार्यों को रोक नहीं पाएंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सावलकोट परियोजना के पूरा होने से भारत सिंधु नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल कर पाएगा, जिससे जम्मू-कश्मीर और मैदानी इलाकों में सिंचाई और घरेलू खपत के लिए अधिक पानी उपलब्ध होगा। यह कदम पाकिस्तान को जल-नीति के मोर्चे पर एक स्पष्ट संदेश भी देता है कि भारत अब अपने वैध अधिकारों का उपयोग करने में पीछे नहीं हटेगा।
आगे की राह
सावलकोट परियोजना के लिए ऑनलाइन टेंडर जमा करने की अंतिम तिथि 10 सितंबर निर्धारित की गई है। यह परियोजना न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक मोर्चे पर भी इसके दूरगामी परिणाम होंगे। भारत के इस कदम के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने और अपनी जल नीतियों पर पुनर्विचार करने का दबाव और बढ़ सकता है।




