राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केन्द्र : भूकंप से हानि कम करने के लिए देशभर में लागू होगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर साल के अंत तक हिमाचल प्रदेश से होगी शुरुआत
राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केन्द्र : भूकंप से हानि कम करने के लिए देशभर में लागू होगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर साल के अंत तक हिमाचल प्रदेश से होगी शुरुआत
भूगर्भीय हलचल शुरू होते ही मिल जाएगी भूकंप की चेतावनी :-
भूकंप का सटीक पूर्वानुमान करन संभव नहीं है लेकिन इसकी पूर्व चेतावनी से जान-माल का नुकसान अवश्य कम किय जा सकता है। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसेएस) अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित कर रहा है। जापान और ताइवान की विश्वस्तरीय तकनीक के सहयोग से एनसीएस ऐसा सिस्टम तैयार कर रहा है, जिससे जमीन के भीतर फाल्ट लाइन पर भूकंप की पहली हलचल (पी बेब) होते ही केंद्रीय नियंत्रण कक्ष में संकेत आ जाएंगे। इसके बाद भूकंप के झटके (एस वेव यानी सरफेस वेव) लगने से पहले कुछ ही क्षणों में इसका अलर्ट जारी कर दिया जाएगा।
विज्ञानियों के अनुसार, किसी भूकंप में सबसे पहले पी-वेव उठती हैं, जो काफी तेजी से आती हैं। इसके बाद अपेक्षाकृत धीमी रफ्तार से उठने वाली एस-वेव भारी नुकसान पहुंचाती हैं। अर्ली वार्निंग सिस्टम पहले तेजी से उठने वाली पी-वेव की पहचान कर तुरंत नियंत्रण कक्ष को इसकी सूचना भेज देता है। इस सूचना में यह भी शामिल रहता है कि धरती कहां तक हिलेगी और भूकंप का आकार क्या होगा।
NATIONAL CENTER FOR SEISMOLOGY :
एनसीएस के मुताबिक, फिलहाल देशभर में भूकंप की गतिविधियों पर निगाह रखने के लिए जमीन के नीचे 168 सिस्मोग्राफी एवं एक्सिलरोग्राफी उपकरण स्थापित किए जा चुके हैं। एक सौ और उपकरण लगाए जाएंगे। 34 ग्लोबल नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) लगाने पर भी काम शुरू होने वाला है। दिल्ली-एनसीआर में 25 उपकरण लगे हैं, 15 जीएनएसएस भी स्थापित किए गए हैं। एनसीएस के अनुसार, डाटा रिसीविंग स्टेशन की मदद से संभावित भूकंप के संकेत प्रामाणिक तौर पर जल्दी मिल जाएंगे। संकेत मिलते ही राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरएफ) की सहायता से सभी संबंधित राज्य सरकारों, जिला प्रशासन, अस्पतालों, स्थानीय निकायों की सूचना जारी कर दी जाएगी।
डा. ओषी मिश्रा, निदेशक, राष्ट्रीय भूकंष विज्ञान केंद्र :
“पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर साल के अंत या नए साल के प्रारंभ में में हिमाचल प्रदेश से इसकी शुरुआत की जाएगी। एनसीएस के विज्ञानियों के अनुसार, पी-वेव और एस-वेव के बीच समय का अंतराल अधिकतम कुछ मिनटों का होता है, लेकिन तब भी बिजली आपूर्ति बंद करके, पेट्रोल पंपों पर एहतियात बरतकर, अग्निशमन विभाग को अलर्ट मोड पर रखकर राज्य और जिला स्तर पर बचाव के उपाय कर सकते हैं।”
उत्तराखंड का 250 किमी भूभाग अति संवेदनशील :-
भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील उत्तराखंड में 250 किलोमीटर का भूभाग ऐसा है, जहां धरती सिकुड़ने वाली स्थिति में है। जिससे भूगर्भ में भूकंपीय ऊर्जा तेजी से एकत्रित हो रही है। ऐसी स्थिति कभी भी सात से आठ रिक्टर स्केल के भूकंप को जन्म दे सकती है। यह बात वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में अंडरस्टैंडिंग हिमालयन अर्थक्वेक्स विषय पर आयोजित कार्यशाला में सामने आई।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डा. विनीत गहलोत के अनुसार, हिमालय अपनी उत्पत्ति के समय से उत्तर से दक्षिण की तरफ खिसक रहा है। यह गति सलाना 40 मिलीमीटर (एमएम) है, लेकिन टनकपुर से राजधानी देहरादून के बीच यह गति औसतन 18 एमएम है। कुछ स्थानों पर यह गति महज 14 एमएम हो पाई गई है। विभिन्न स्थलों पर लगे जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) के माध्यम से इसका पता लगाया गया। वहीं, विज्ञानी डा. आरजे पेरुमल ने कहा कि मुनस्यारी से देहरादून के मोहंड के बीच 80 किलोमीटर भूभाग ऐसा है, जहां की भूमि सालाना औसतन 20 एमएम की दर से खिसक रही है। इससे पूरा भूभाग लाकिंग जोन की स्थिति में आ गया है।