भारत और रूस के बीच कूटनीतिक रिश्ते दशकों से गहरे और बहुआयामी रहे हैं। हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर मॉस्को पहुंचे, जहां उन्होंने अपने रूसी समकक्ष सर्गेई लावरोव से महत्वपूर्ण वार्ता की। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका ने रूसी तेल पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का निर्णय लिया है। इस वैश्विक पृष्ठभूमि में भारत-रूस वार्ता न केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिए, बल्कि वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी अहम मानी जा रही है।
जयशंकर ने इस मौके पर कहा कि “भारत और रूस को अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहिए। हमें एक ही रास्ते पर अटकना नहीं चाहिए, बल्कि नई संभावनाओं की तलाश करनी चाहिए।”
भारत-रूस रिश्तों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत और रूस (सोवियत संघ के समय से) के संबंधों की नींव गहरी है।
- 1971 का भारत-सोवियत शांति और मैत्री समझौता इन रिश्तों का प्रतीक था।
- रूस ने भारत को रक्षा, ऊर्जा और विज्ञान-तकनीक के क्षेत्रों में लगातार सहयोग दिया।
- परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम और रक्षा तकनीक में भारत को बड़ी मदद रूस से ही मिली।
आज भी रूस भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार है और दोनों देश मिलकर ऊर्जा, अंतरिक्ष और विज्ञान में नए आयाम खोज रहे हैं।
मॉस्को वार्ता का एजेंडा
जयशंकर और लावरोव की मुलाकात कई अहम विषयों पर केंद्रित रही:
- ऊर्जा सहयोग
- रूस भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल सप्लाई कर रहा है।
- अमेरिका और यूरोपीय दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ाया।
- अब सवाल है कि अमेरिकी टैरिफ का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर कितना पड़ेगा।
- व्यापार और निवेश
- भारत-रूस का द्विपक्षीय व्यापार 50 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है।
- दोनों देश इसे 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रख रहे हैं।
- रूसी कंपनियां भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं।
- रणनीतिक सहयोग
- रक्षा क्षेत्र में ब्रह्मोस मिसाइल जैसे संयुक्त प्रोजेक्ट पहले से चल रहे हैं।
- दोनों देशों की सेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यास होते रहते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दोनों देशों की नजदीकी बनी हुई है।
अमेरिकी टैरिफ और भारत-रूस समीकरण
अमेरिका ने रूस के तेल पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है।
- भारत की स्थिति – भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। कच्चे तेल का लगभग 85% भारत विदेशों से खरीदता है।
- रूस से सस्ते तेल की आपूर्ति ने भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत दी है।
- अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है।
जयशंकर का बयान साफ संकेत देता है कि भारत “एकतरफा दबाव” में आने वाला नहीं है।
जयशंकर का संदेश
जयशंकर ने मॉस्को में कहा:
- भारत और रूस को केवल पारंपरिक क्षेत्रों पर नहीं रुकना चाहिए।
- नए क्षेत्रों जैसे डिजिटल अर्थव्यवस्था, फार्मा, कृषि और शिक्षा में भी साझेदारी बढ़ानी चाहिए।
- भारत वैश्विक मंच पर “बहुध्रुवीय व्यवस्था” का समर्थन करता है, जहां हर देश अपने हितों के हिसाब से निर्णय ले सके।
रूस की प्राथमिकताएँ
रूस पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण नए बाजारों की तलाश कर रहा है। भारत उसके लिए एक बड़ा और भरोसेमंद साझेदार है।
- रूस को एशियाई देशों में अपने निर्यात का बड़ा हिस्सा भेजना पड़ रहा है।
- भारत की जनसंख्या और ऊर्जा ज़रूरतें रूस के लिए अवसर हैं।
- रक्षा और अंतरिक्ष तकनीक में भी रूस भारत के साथ सहयोग जारी रखना चाहता है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रूस
भारत की ऊर्जा सुरक्षा उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- रूस से सस्ते कच्चे तेल की आपूर्ति ने भारत को मुद्रास्फीति से बचाए रखा।
- भारत ने इस तेल को रिफाइन कर अन्य देशों को भी एक्सपोर्ट किया, जिससे उसकी स्थिति और मजबूत हुई।
- भविष्य में रूस और भारत LNG (Liquefied Natural Gas) और परमाणु ऊर्जा में भी सहयोग बढ़ा सकते हैं।
वैश्विक राजनीति और भारत की भूमिका
आज की वैश्विक राजनीति में भारत का स्थान अलग है।
- भारत पश्चिम के साथ भी साझेदारी करता है और रूस के साथ भी।
- अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता दी।
- रूस और चीन के साथ BRICS और SCO जैसे मंचों पर भारत की भूमिका अहम है।
इस तरह भारत खुद को “Global Balancer” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
- अमेरिकी दबाव – भारत को रूस से तेल खरीदने पर आलोचना का सामना करना पड़ता है।
- भुगतान प्रणाली – पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रुपये-रूबल व्यापार में दिक्कतें आती हैं।
- रूस-चीन समीकरण – रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए चिंता का विषय है।
- यूरोपीय आलोचना – यूरोप चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए।
इन चुनौतियों के बावजूद भारत और रूस अपने रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
व्यापार के नए अवसर
- डिजिटल टेक्नोलॉजी – भारत की आईटी कंपनियां रूस में बड़ा योगदान दे सकती हैं।
- फार्मा उद्योग – भारत रूस को सस्ती और प्रभावी दवाइयां उपलब्ध करा सकता है।
- कृषि – रूस के पास बड़ी ज़मीन और संसाधन हैं, जबकि भारत के पास कृषि तकनीक और बाज़ार।
- शिक्षा और संस्कृति – भारतीय छात्रों के लिए रूस हमेशा से मेडिकल शिक्षा का हब रहा है।
मीडिया और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया
भारतीय और रूसी मीडिया ने इस मुलाकात को “रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय” बताया।
- ट्विटर (X) पर #JaishankarInMoscow और #IndiaRussiaRelation ट्रेंड कर रहे हैं।
- विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक संदेश भी है कि भारत किसी दबाव में नहीं झुकता।
जयशंकर और लावरोव की मॉस्को बैठक भारत-रूस रिश्तों के नए आयाम खोलती है। अमेरिका और यूरोप के दबाव के बीच भारत ने फिर साबित किया कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
भारत और रूस की साझेदारी न केवल ऊर्जा और व्यापार तक सीमित है, बल्कि यह रणनीतिक विश्वास और ऐतिहासिक रिश्तों पर भी टिकी हुई है। आने वाले समय में यह सहयोग और गहरा होगा और वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका और भी मजबूत बनेगी।




