समिति ने कहा-पद पर रहने लायक नहीं जस्टिस वर्मा, हटाने की जरूरत :
सरकारी आवास में बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के आरोपों का सामना कर रहे इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के लिए मुश्किलों का सफर शुरू होने वाला है। तीन न्यायाधीशों की जांच समिति ने आरोपों की जांच करने के बाद पाया कि कदाचार साबित होता है। समिति का मानना है कि जस्टिस वर्मा पद पर बने रहने के लायक नहीं हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा पर लगे आरोप गंभीर हैं और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत है। ध्यान रहे कि तीन मई को आई यह रिपोर्ट लीक हो गई है।
संसद में महाभियोग लाने के लिए राजनीतिक दलों से विमर्श शुरू कर चुकी है सरकार :
इस रिपोर्ट के आधार पर ही तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने भी महाभियोग चलाने की अनुशंसा की थी। यह गोपनीय रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा का जवाब जस्टिस खन्ना ने आठ मई को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी थी।
जस्टिस खन्ना की अनुशंसा पर पहले ही सरकार के स्तर पर कार्रवाई शुरू हो चुकी है। राजनीतिक दलों में महाभियोग पर सहमति बनाने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू को जिम्मेदारी दी गई है। 21 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में ही महाभियोग लाया जाएगा।
मामला सामने आने के बाद तत्कालीन सीजेआइ संजीव खन्ना ने किया था जांच समिति का गठन :
जस्टिस वर्मा जब दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे, तब 14 मार्च की रात 11.35 बजे उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान उनके घर के स्टोर रूम से बड़ी मात्रा में जले हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं। इसके बाद जस्टिस संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की एक समिति बनाई थी।
इस जांच समिति ने 10 दिन तक जांच करने, 55 गवाहों से पूछताछ करने व इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों को जांचने के बाद पाया कि जस्टिस वर्मा पर कदाचार साबित होता है। आरोप सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा से न्यायिक कामकाज वापस ले लिया गया था और उनको इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया गया था। अभी वह इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश हैं, लेकिन न्यायिक कामकाज से विरत हैं। जस्टिस वर्मा ने यह प्रकरण सामने आने के बाद खुद को निर्देष बताते हुए मामले को साजिश बताया था।
जस्टिस वर्मा ने अपनी भूमिका से इन्कार किया :
जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त जांच पैनल के समक्ष अपने आधिकारिक आवास से नोट मिलने के मामले में अपनी संलिप्तता से इन्कार किया है। उन्होंने कहा कि स्टोर रूम उनके रहने के क्वार्टर का हिस्सा नहीं था। स्टोर रूम के प्रवेश द्वार पर लगातार सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जाती थी और यह सुरक्षा कर्मियों के नियंत्रण में था। ऐसे में वहां पर नकदी रखा जाना लगभग असंभव था। जस्टिस वर्मा ने आरोपों से इन्कार करते हुए इसे साजिश बताया है।
पांच जनवरी, 2031 तक है जस्टिस वर्मा का कार्यकाल :
जस्टिस यशवंत वर्मा का कार्यकाल पांच जनवरी, 2031 तक है। ऐसे में अगर आरोपी को देखते हुए जस्टिस वर्मा पद से इस्तीफा नहीं देते हैं और महाभियोग का सामना करने पर अड़े रहते हैं तो महाभियोग सफल नहीं होने की स्थिति में वह पांच जनवरी 2031 तक न्यायाधीश के पद पर बने रहेंगे। नियम के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीश को सिर्फ महाभियोग की प्रक्रिया के जरिये ही पद से हटाया जा सकता है।
पैनल ने इन तीन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की :
* जस्टिस वर्मा अपने आवास के स्टोर रूम में पैसे की मौजूदगी के बारे में क्या बताते हैं?
* समिति ने जस्टिस वर्मा से पूछा कि स्टोर रूम में मिले पैसे का स्रोत क्या था?
* 15 मार्च की सुबह स्टोर रूम से जले हुए नोटों को निकालने वाला व्यक्ति कौन था?
तीन न्यायाधीशों जस्टिस शील नागू, जीएस संधावालिया और अनु शिवरामन की कमेटी ने तीन मई, 2025 की दी अपनी 64 पन्नों की रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास 30 तुगलक क्रिसेंट का स्टोर रूम जहाँ नकदी पाई गई थी, जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के नियंत्रण में था।
मौजूद साक्ष्यों के आधार पर साबित होता है कि जली हुई नकदी को 15 मार्च, 2025 को तड़के वहां से हटा दिया गया था। रिकार्ड पर मौजूद प्रत्यक्ष और इलेक्ट्रानिक सुबूतों को देखते हुए कमेटी का मानना है कि भारत के प्रधान न्यायाधीश (तत्कालीन सीजेआइ संजीव खन्ना) के 22 मार्च, 2025 के पत्र में बताए गए आरोपों में पर्याप्त तथ्य हैं।
जली नकदी वहां से हटाए जाने के बारे में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि रिकार्ड पर मौजूद चश्मदीदों की गवाहियों, इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को समग्रता से देखने पर और जस्टिस वर्मा व उनके निजी स्टाफ के बयानों में विरोधाभास को देखते हुए कमेटी यह कहने के लिए मजबूर है कि जस्टिस वर्मा के बहुत विश्वसनीय घरेलू स्टाफ ने दमकल कर्मियों और पुलिस कर्मियों के जाने के बाद 15 मार्च को तड़के स्टोर रूम से जले हुए नेटों को हटाया था।
रिपोर्ट में नकदी हटाने वाले स्टाफ के नाम भी दिए गए हैं। रिपोर्ट बहुत विस्तृत है। उसमें घटनास्थल के दौरे के साथ 55 लोगों के बयान दर्ज किए गए हैं। जस्टिस वर्मा और उनके परिवार बालों के भी बयान दर्ज किए गए और सभी का समग्रता से विश्लेषण करने के बाद कमेटी ने यह निष्कर्ष दिया है।