भारत की न्यायपालिका समय-समय पर ऐसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण फैसले देती है जो सीधे तौर पर समाज और आम नागरिकों के जीवन से जुड़े होते हैं। आज सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद अहम मामला सुना गया – दिल्ली-एनसीआर में बढ़ती आवारा कुत्तों की संख्या और उन्हें शेल्टर होम में रखने की मांग। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना फैसला सुनाया, जिसे न केवल दिल्ली-एनसीआर बल्कि पूरे देश में बड़ी दिलचस्पी से देखा जा रहा है।
पृष्ठभूमि: क्यों उठी यह याचिका?
दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
- पिछले कुछ वर्षों में डॉग-बाइट (कुत्तों के काटने) के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है।
- स्कूल जाते बच्चों, बुजुर्गों और सुबह-सुबह टहलने वालों पर अक्सर आवारा कुत्तों के हमलों की खबरें आती रहती हैं।
- कई गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और स्थानीय निवासियों ने बार-बार यह मांग उठाई कि आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर शेल्टर होम्स में रखा जाए।
इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट में एक सार्वजनिक हित याचिका (PIL) दायर की गई थी, जिसमें अनुरोध किया गया कि दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को व्यवस्थित ढंग से शेल्टर होम्स में स्थानांतरित किया जाए, ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और पशु अधिकारों की रक्षा भी बनी रहे।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मामले को बेहद संवेदनशील मानते हुए कहा कि इसमें दो पहलू हैं –
- मानव जीवन और सुरक्षा – नागरिकों का सुरक्षित रहना और डॉग-बाइट जैसी घटनाओं को रोकना।
- पशु अधिकार और संरक्षण – संविधान के अनुच्छेद 51(जी) के तहत हर नागरिक का कर्तव्य है कि पशुओं के साथ दया और करुणा का व्यवहार किया जाए।
याचिकाकर्ता की दलीलें:
- दिल्ली-एनसीआर में हजारों आवारा कुत्ते खुले में घूम रहे हैं।
- आए दिन डॉग-बाइट के मामले सामने आते हैं, जिनसे बच्चों और बुजुर्गों की जान तक चली जाती है।
- नगर निगम और स्थानीय निकाय इस समस्या को नियंत्रित करने में नाकाम रहे हैं।
- समाधान के रूप में, सभी आवारा कुत्तों को शेल्टर होम्स में रखा जाए और वहीं पर उनकी देखभाल की जाए।
विपक्ष की दलीलें (NGOs और एनिमल वेलफेयर समूह):
- आवारा कुत्तों को जबरन शेल्टर होम्स में कैद करना क्रूरता है।
- पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control – ABC) प्रोग्राम पहले से मौजूद है, जिसके तहत कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण कराया जाता है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी “कैच-न्यूटर-रिलीज़” (CNR) पॉलिसी को मान्यता प्राप्त है।
- सभी कुत्तों को शेल्टर में रखना न तो संभव है और न ही व्यावहारिक, क्योंकि इसके लिए बड़े पैमाने पर संसाधन और भूमि चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद एक संतुलित फैसला दिया।
कोर्ट के मुख्य निर्देश:
- सभी शहरी स्थानीय निकाय (नगर निगम, नगर परिषद आदि) को आदेश – वे आवारा कुत्तों के लिए पर्याप्त संख्या में अस्थायी शेल्टर होम्स विकसित करें।
- ABC (Animal Birth Control) प्रोग्राम को सख्ती से लागू करने का निर्देश – सभी आवारा कुत्तों की नसबंदी और रेबीज का टीकाकरण अनिवार्य होगा।
- मानव सुरक्षा को प्राथमिकता – कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कुत्ता आक्रामक है और लोगों पर हमला कर रहा है, तो उसे तुरंत शेल्टर में ले जाया जाए।
- फंडिंग और मॉनिटरिंग – केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर इसके लिए विशेष बजट तैयार करने और एक निगरानी समिति बनाने का निर्देश दिया गया।
- NGOs की भागीदारी – कोर्ट ने पशु कल्याण संगठनों को इस प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश दिया, ताकि कुत्तों के साथ क्रूरता न हो और उनकी देखभाल ठीक से हो।
इस फैसले का असर
1. आम नागरिकों के लिए राहत
- सड़कों पर आवारा कुत्तों के डर से मुक्त होकर लोग सुरक्षित महसूस करेंगे।
- डॉग-बाइट के मामलों में कमी आएगी।
- बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
2. पशु अधिकारों की रक्षा
- सभी कुत्तों को उचित देखभाल, भोजन और चिकित्सा मिलेगी।
- शेल्टर होम्स में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दी जाएंगी।
- नसबंदी और टीकाकरण से आवारा कुत्तों की संख्या धीरे-धीरे नियंत्रित होगी।
3. प्रशासन और नगर निगम की जिम्मेदारी
- अब स्थानीय निकायों को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
- कोर्ट ने साफ कहा है कि लापरवाही पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
चुनौतियाँ भी कम नहीं
हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सकारात्मक है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं:
- शेल्टर होम्स के लिए पर्याप्त भूमि और संसाधन जुटाना।
- कुत्तों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित स्टाफ और डॉक्टरों की व्यवस्था।
- बड़े पैमाने पर नसबंदी और टीकाकरण अभियान चलाना।
- नागरिकों को जागरूक करना ताकि वे आवारा कुत्तों को मारने या उनके साथ क्रूरता करने की बजाय कानून का पालन करें।
विशेषज्ञों की राय
- पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह फैसला पशु कल्याण और मानव सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन बनाता है।
- कानून विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 51(जी) (पशु कल्याण) दोनों के बीच संतुलन बैठाकर एक ऐतिहासिक आदेश दिया है।
- स्थानीय निवासियों का कहना है कि अब उन्हें राहत मिलेगी, लेकिन सरकार को तुरंत इसका पालन कराना चाहिए।
दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों की समस्या लंबे समय से गंभीर रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल इस क्षेत्र बल्कि पूरे देश के लिए दिशा-निर्देश का काम करेगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि नागरिकों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है जितनी कि पशु अधिकारों की रक्षा।
यदि इस आदेश को सही ढंग से लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत में आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्याओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकेगा।




