जैसा कि आपने उल्लेख किया है, यह खबर 11 जुलाई, 2025 तक की है। इस तारीख तक, पूर्व CJI चंद्रचूड़ (जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) का यह बयान ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर गठित जेपीसी की बैठक में दिए जाने की खबर है।
नई दिल्ली: ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation One Election) के महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक में पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई.1 चंद्रचूड़ ने चुनाव आयोग को “बेलगाम ताकत” दिए जाने के प्रति कड़ी चेतावनी दी है।2 उनके इस बयान ने एक साथ चुनाव के प्रस्ताव से जुड़े संवैधानिक और लोकतांत्रिक सरोकारों को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

क्या कहा पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने?
सूत्रों के अनुसार, जेपीसी की बैठक में ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श के दौरान, पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए चुनाव आयोग को अत्यधिक और अप्रतिबंधित शक्तियां देना लोकतंत्र के लिए हानिकारक हो सकता है। उन्होंने जोर दिया कि जहां चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और दक्षता महत्वपूर्ण है, वहीं उसे असीमित अधिकार देना संवैधानिक संतुलन और जवाबदेही के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
माना जा रहा है कि उनका इशारा उन संभावित प्रावधानों की ओर था, जहां चुनाव आयोग को ऐसी शक्तियां दी जा सकती हैं जिससे वह राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के कार्यकाल को निर्धारित करने या उनमें बदलाव करने में अंतिम निर्णय ले सके, ताकि चुनावों को एक साथ आयोजित किया जा सके। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस तरह की शक्तियों का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए और एक मजबूत संवैधानिक निगरानी प्रणाली होनी चाहिए।
क्या है ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का प्रस्ताव?
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का विचार लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से संबंधित है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे चुनाव प्रक्रिया में लगने वाले भारी खर्च, प्रशासनिक बोझ और आचार संहिता के कारण होने वाले विकास कार्यों में व्यवधान को कम किया जा सकेगा।
चुनौतियां और सरोकार:
हालांकि, इस प्रस्ताव के साथ कई चुनौतियां और सरोकार भी जुड़े हुए हैं, जिन पर बहस जारी है:
- संवैधानिक संशोधन: इसे लागू करने के लिए संविधान में कई महत्वपूर्ण संशोधन करने होंगे, जिनमें अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि) और अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं की अवधि) प्रमुख हैं।
- राज्य सरकारों की स्वायत्तता: यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त होता है (उदाहरण के लिए, अविश्वास प्रस्ताव या आपातकाल के कारण), तो नए चुनाव कब होंगे, यह एक बड़ा सवाल है। क्या तब तक राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा या फिर विधानसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया जाएगा?
- संघीय ढांचा: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह राज्यों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे को कमजोर कर सकता है।
- मतदाताओं का ध्यान: एक साथ चुनाव होने पर मतदाता स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित हो सकते हैं।
- चुनाव आयोग की शक्ति: पूर्व CJI चंद्रचूड़ का बयान इसी बिंदु पर केंद्रित है। चुनाव आयोग को एक साथ चुनाव कराने के लिए दी जाने वाली शक्तियों की प्रकृति और सीमा पर गहरी बहस की आवश्यकता है।
आगे क्या?
जेपीसी ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के सभी पहलुओं पर विभिन्न हितधारकों, विशेषज्ञों और पूर्व न्यायविदों के साथ विचार-विमर्श कर रही है। पूर्व CJI चंद्रचूड़ जैसे सम्मानित कानूनी विशेषज्ञों के इनपुट इस महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह देखना होगा कि समिति इन चिंताओं को कैसे संबोधित करती है और क्या एक ऐसा खाका तैयार किया जाता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों को अक्षुण्ण रखते हुए इस बड़े बदलाव को संभव बना सके।




