📰 यूएई की यमन से सेना वापसी: मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा बदलाव

यमन से यूएई की सैन्य मौजूदगी का अंत
मध्य पूर्व की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि उसने यमन से अपने सभी सैनिकों को वापस बुला लिया है।
यूएई के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सैनिकों और सैन्य उपकरणों की वापसी की पूरी प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई है। इस कदम को क्षेत्रीय संतुलन और कूटनीति के लिहाज से एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
रक्षा मंत्रालय की आधिकारिक घोषणा


यूएई के रक्षा मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि यमन में तैनात सभी सैन्य इकाइयों को चरणबद्ध तरीके से वापस लाया गया है। मंत्रालय के अनुसार, यह निर्णय पहले से तय रणनीति के तहत लिया गया और इसमें किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं की गई।
बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि वापसी के दौरान सैनिकों की सुरक्षा और सैन्य उपकरणों की सुरक्षित निकासी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
यमन संघर्ष में यूएई की भूमिका
यमन में लंबे समय से जारी संघर्ष में यूएई एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। यूएई ने सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन के तहत यमन में सैन्य हस्तक्षेप किया था।
इस संघर्ष का उद्देश्य यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करना और विद्रोही गुटों के प्रभाव को सीमित करना बताया गया था। वर्षों तक चली इस सैन्य मौजूदगी ने यमन की आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों को गहराई से प्रभावित किया।
सेना वापसी के पीछे संभावित कारण
विश्लेषकों के अनुसार, यूएई के इस फैसले के पीछे कई रणनीतिक कारण हो सकते हैं:
- लंबे समय से चल रहे संघर्ष का कोई स्पष्ट समाधान न निकलना
- क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिश
- कूटनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में बदलाव
- अंतरराष्ट्रीय दबाव और मानवीय संकट को लेकर बढ़ती चिंता
यूएई हाल के वर्षों में अपनी विदेश नीति में संतुलन और कूटनीति पर अधिक जोर देता नजर आया है।
मध्य पूर्व की भू-राजनीति पर असर
यूएई की यमन से सेना वापसी को मध्य पूर्व की राजनीति में एक अहम मोड़ माना जा रहा है।
इस फैसले से क्षेत्रीय गठबंधनों, शक्ति संतुलन और भविष्य की सैन्य रणनीतियों पर असर पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम क्षेत्र में सैन्य टकराव की बजाय संवाद और कूटनीति को बढ़ावा दे सकता है।
यमन में मौजूदा स्थिति
यमन पहले ही गंभीर मानवीय संकट से जूझ रहा है। वर्षों के संघर्ष ने देश की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और बुनियादी ढांचे को बुरी तरह प्रभावित किया है।
यूएई की सेना वापसी के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या इससे यमन में शांति प्रक्रिया को गति मिलेगी या शक्ति संतुलन में नया अस्थिरता का दौर शुरू होगा।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया
यूएई के इस फैसले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। कई देशों और संगठनों ने यमन संकट के राजनीतिक समाधान पर जोर देते हुए सैन्य कार्रवाई की बजाय वार्ता का समर्थन किया है।
विश्लेषकों का कहना है कि यूएई की यह पहल भविष्य में शांति वार्ताओं के लिए अनुकूल माहौल बना सकती है।
खाड़ी देशों के लिए क्या मायने
खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों के लिए भी यह फैसला महत्वपूर्ण है। यूएई की रणनीति में बदलाव से क्षेत्रीय सहयोग, सुरक्षा नीति और सामूहिक रक्षा योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
यह कदम संकेत देता है कि क्षेत्रीय शक्तियां अब लंबे सैन्य अभियानों की बजाय स्थिरता और आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहती हैं।
आगे की राह
हालांकि यूएई ने अपनी सेना वापस बुला ली है, लेकिन यमन संकट का समाधान अभी दूर है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या यह कदम राजनीतिक संवाद को मजबूती देता है या संघर्ष के नए समीकरण पैदा करता है।
यमन से यूएई की पूरी सेना वापसी मध्य पूर्व की राजनीति में एक निर्णायक बदलाव के रूप में देखी जा रही है। यह फैसला न केवल यूएई की बदलती विदेश नीति को दर्शाता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक समाधान की दिशा में एक संकेत भी देता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि इस कदम का यमन और पूरे मध्य पूर्व पर दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा।








