मणिपुर पर राजनीतिक और संगठनात्मक फोकस: जेपी नड्डा और मोहन भागवत का इंफाल दौरा

मणिपुर पर राजनीतिक और संगठनात्मक फोकस: जेपी नड्डा और मोहन भागवत का इंफाल दौरा
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मणिपुर आज राजनीतिक और संगठनात्मक नजरिए से एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का इंफाल दौरा राज्य की वर्तमान स्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और संगठन की मजबूती को लेकर बड़े संकेत दे रहा है।

पृष्ठभूमि और महत्व

मई 2023 में मणिपुर में मेटेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़कने के बाद से राज्य लगातार सुर्खियों में रहा है। यह हिंसा लाखों लोगों को प्रभावित कर चुकी है और राजनीतिक, सामाजिक अस्थिरता को गहरा प्रभाव पहुंचाया है। ऐसे समय में नड्डा और भागवत की यात्रा चर्चा का केंद्र बन गई है — यह न सिर्फ एक राजनीतिक कदम माना जा रहा है, बल्कि समाज को जोड़ने, संवाद को बढ़ाने और साफ-साफ संदेश देने की कोशिश भी।

विशेष रूप से, भागवत का यह दौरा उनका पहला मणिपुर आगमन है उस हिंसा के बाद और यह RSS के शताब्दी वर्ष समारोह के हिस्से के रूप में हो रहा है।

 जेपी नड्डा की स्थिति

हालाँकि कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया था कि नड्डा मणिपुर दौरे पर हैं, लेकिन अभी की ताज़ा ख़बरों के मुताबिक़, उनकी यात्रा रद्द कर दी गई है। उन्होंने पहले IMPHAL के RIMS (Regional Institute of Medical Sciences) में नए OPD ब्लॉक का उद्घाटन करना था और अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेना था।

अगर नड्डा का दौरा होता, तो यह भाजपा द्वारा मणिपुर में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जाता — खासकर विधानसभा चुनावों या शांति बहाली के जरिए। लेकिन फिलहाल रद्दीकरण से यह सवाल उठता है कि दल की प्राथमिकताएँ क्या हैं और मणिपुर में उनकी रणनीति कैसी होगी।

मोहन भागवत का दौरा — शांति और संगठन

वहीं दूसरी ओर, RSS प्रमुख मोहन भागवत अपनी तीन दिन की यात्रा के लिए इंफाल पहुंचे हैं।यह दौरा RSS के शताब्दी वर्ष समारोह का हिस्सा है और उनका मुख्य फोकस भीतरी संवाद पर रहा है — सार्वजनिक रैली की बजाय बंद कमरों में बैठकों, युवा नेताओं और जनजातीय प्रतिनिधियों से बात करना।

भागवत ने अपने भाषण में कहा है कि “विनाश में दो मिनट लगते हैं, लेकिन निर्माण में साल­ों लगते हैं” — यह कथन मणिपुर की संवेदनशील स्थिति और वहां शांति बहाली की प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाता है।उन्होंने मौजूदा असंतुलन पर चिंता व्यक्त की और कहा कि संघ की नीयत सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि सामाज-संरचनात्मक मजबूती बनाना है।

उनका यह भी कहना है कि RSS को अक्सर गलतफहमियों और दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा है, और लोग संघ को उसकी गलत धारणाओं की बजाय तथ्यों के आधार पर समझें

इसके अलावा, हिस्सा-बने रहने वाले एजेंडा प्वाइंट्स में भागवत ने सामाजिक समरसता, नागरिक जिम्मेदारी, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता पर ज़ोर दिया है।

मणिपुर पर संदेश का दोहरा अर्थ

  • राजनीतिक संदेश: नड्डा का (हालांकि रद्द हुआ) दौरा भाजपा की मणिपुर में सक्रियता को दर्शाता है। अगर वह पहले की योजना के अनुसार आए होते, तो यह संकेत माना जाता कि पार्टी मणिपुर को केंद्र में ले रही है — चुनावी रणनीति, विकास व सुरक्षा के मुद्दों पर।
  • संघ का मजबूत असर: भागवत का दौरा संघ की मणिपुर में पकड़ को मजबूत करने का प्रयास भी है — विशेष रूप से जातीय रूप से विभाजित राज्य में जहां संघ का प्रभाव सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर हो सकता है।
  • शांति और पुनर्स्थापना: संघ प्रमुख का “निर्माण” का संदेश यह दिखाता है कि किसी तेजी से बदलाव की बजाय दीर्घकालीन शांति, समावेश और समझ बढ़ाने पर जोर है। यह एक स्थिरता-अभिगम की ओर संकेत कर सकता है।
  • संवाद की भूमिका: भागवत की बंद कमरों में बैठकों की रणनीति यह दिखाती है कि खुली रैलियों के बजाय अंदरूनी विचार-विमर्श को प्राथमिकता दी जा रही है — शायद इसलिए कि जातीय और सामाजिक मुद्दों पर संवेदनशीलता ज़्यादा है और सार्वजनिक मंचों पर बयानबाज़ी कम सुरक्षित विकल्प हो सकती है।

चुनौतियाँ और संभावनाएँ

  • मणिपुर में अभी भी वैश्विक और स्थानीय दबाव मौजूद हैं — शांति बहाली, विस्थापितों की पुनर्वास प्रक्रिया, जातीय विश्वास बहाली — ये सभी बड़े मुद्दे हैं।
  • संघ की मंशा को देखते हुए, यह देखना होगा कि वह कितनी सक्रिय रूप से समाज के विभिन्न हिस्सों (मुख्य रूप से युवा, जनजातीय नेता और नागरिक समाज) के साथ संवाद को आगे बढ़ाता है।
  • भाजपा के लिए भी, नड्डा का दौरा (अगर हुआ होता) स्थानीय नेताओं, जनजातीय प्रतिनिधियों और अन्य समुदायों के साथ उसके भरोसे और नीतिगत समर्थन को मापने का अवसर होता। रद्दीकरण से यह रणनीति थोड़ा उलझी हुई सी दिखती है।
  • लंबे समय में, अगर संघ और भाजपा दोनों मणिपुर में स्थिरता, विकास और सांस्कृतिक एकजुटता पर काम करते हैं, तो यह राज्य की शांति प्रक्रिया में सकारात्मक योगदान दे सकता है।

निष्कर्ष

जेपी नड्डा और मोहन भागवत का मणिपुर दौरा — खासकर इंफाल में — सिर्फ एक औपचारिक विज़िट नहीं है। यह एक मजबूत राजनीतिक और संगठनात्मक बयान है: भाजपा अपनी राज्य स्तर की पकड़ को परख रही है, जबकि RSS सामुदायिक और सामाजिक पुनर्रचना को महत्व दे रही है।

भागवत का निर्माण-परक दृष्टिकोण और शांति-संवाद पर जोर यह दर्शाता है कि संघ मणिपुर को सिर्फ संगठनात्मक विस्तार का क्षेत्र नहीं, बल्कि दीर्घकालीन समरसता का मॉडल मानता है। वहीं भाजपा के अभ्यागत संकेत — चाहे रद्द हो गए — यह बताते हैं कि राज्य उनकी रणनीति में केंद्रीय है।

यदि ये दौरे सही तरह आगे बढ़ें, तो मणिपुर के लिए यह सिर्फ राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि शांति, विकास और पुनर्निर्माण का एक नया अध्याय खोलने का अवसर हो सकता है।

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