मध्य-पूर्व के अहम देश ईरान में आर्थिक संकट अब सड़कों पर गुस्से के रूप में दिखाई देने लगा है। राष्ट्रीय मुद्रा ईरानी रियाल की ऐतिहासिक गिरावट और बेकाबू होती महंगाई के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। हालात ऐसे हैं कि आम जनता का गुस्सा अब सीधे सत्ता और धार्मिक नेतृत्व की ओर मुड़ता दिख रहा है। कई शहरों में “Mullas Must Leave” यानी धार्मिक नेताओं को सत्ता छोड़नी होगी जैसे नारे गूंज रहे हैं।
क्या है विरोध प्रदर्शन की वजह


ईरान इस समय गंभीर आर्थिक दबाव से गुजर रहा है। रियाल की कीमत डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों पर पड़ा है—खाद्य पदार्थ, ईंधन, दवाइयां और किराया आम आदमी की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार,
- लगातार महंगाई
- बेरोजगारी में बढ़ोतरी
- विदेशी प्रतिबंधों का असर
- सरकारी नीतियों पर भरोसे की कमी
इन सबने मिलकर जनता को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है।
किन शहरों में भड़का विरोध

रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजधानी तेहरान सहित कई बड़े और मध्यम शहरों में विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं। बाजारों, विश्वविद्यालयों और औद्योगिक इलाकों में लोगों ने प्रदर्शन कर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
कुछ शहरों में हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच आमना-सामना हो गया। कई जगहों पर झड़पों और गिरफ्तारियों की भी खबरें हैं।
“मुल्लास मस्ट लीव” नारे का अर्थ


इस बार के प्रदर्शनों की सबसे अहम बात यह है कि नारे सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं हैं। “मुल्लास मस्ट लीव” जैसे नारे सीधे धार्मिक नेतृत्व और शासन व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यह नारा संकेत देता है कि जनता की नाराजगी अब केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक असंतोष में भी बदल रही है।
सुरक्षा बलों की सख्ती
स्थिति को काबू में करने के लिए ईरानी सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। कई शहरों में अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी नजर रखी जा रही है, ताकि प्रदर्शनों को संगठित होने से रोका जा सके।
सरकारी बयान में कहा गया है कि “कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की किसी भी कोशिश से सख्ती से निपटा जाएगा।” हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर चिंता जताई है।
सरकार की प्रतिक्रिया
ईरानी सरकार का कहना है कि मौजूदा आर्थिक हालात के लिए विदेशी प्रतिबंध और वैश्विक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। सरकार ने दावा किया है कि महंगाई पर काबू पाने और रियाल को स्थिर करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।
लेकिन जनता का एक बड़ा वर्ग इन दावों से संतुष्ट नहीं दिख रहा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि समस्या सिर्फ प्रतिबंध नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही गलत नीतियां और भ्रष्टाचार भी हैं।
पहले भी हो चुके हैं ऐसे प्रदर्शन
ईरान में यह पहली बार नहीं है जब महंगाई और आर्थिक संकट के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे हों। पिछले कुछ वर्षों में भी ईंधन की कीमतें बढ़ने और बेरोजगारी के मुद्दे पर बड़े विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं।
हालांकि, मौजूदा आंदोलन को लेकर विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बार गुस्सा ज्यादा व्यापक और तीखा है, क्योंकि महंगाई सीधे लोगों की बुनियादी जरूरतों को प्रभावित कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
ईरान में हो रहे प्रदर्शनों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी नजर बनाए हुए है। कई पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने संयम बरतने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की अपील की है।
हालांकि, ईरानी सरकार इसे आंतरिक मामला बताते हुए बाहरी दखल को खारिज करती रही है।
आम जनता की स्थिति
महंगाई ने ईरान के मध्यम और निम्न वर्ग की कमर तोड़ दी है। कई लोग दो वक्त की रोटी, इलाज और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में संघर्ष कर रहे हैं। इसी हताशा और गुस्से ने विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है।
एक प्रदर्शनकारी के मुताबिक, “हमारे पास खोने के लिए अब कुछ नहीं बचा, इसलिए हम सड़कों पर हैं।”
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महंगाई और मुद्रा संकट पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो ये प्रदर्शन और तेज हो सकते हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आर्थिक सुधार और जनता के भरोसे को कैसे बहाल करे।
ईरान में महंगाई और रियाल की गिरावट के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन केवल आर्थिक संकट की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह जनता के बढ़ते असंतोष का संकेत भी हैं। “मुल्लास मस्ट लीव” जैसे नारे बता रहे हैं कि गुस्सा अब व्यवस्था की जड़ों तक पहुंच चुका है। आने वाले समय में सरकार के कदम तय करेंगे कि हालात संभलते हैं या और बिगड़ते हैं।








