हाल ही में आयोजित BRICS सम्मेलन 2025 में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक अहम बयान दिया। उन्होंने कहा कि व्यापारिक नीतियों को गैर-व्यापारिक मामलों जैसे कि पर्यावरण, मानवाधिकार और राजनीतिक मुद्दों से जोड़ना उचित नहीं है। जयशंकर का यह बयान न केवल भारत की विदेश नीति की स्पष्टता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निष्पक्ष व्यापार और पारस्परिक सहयोग का समर्थन करता है।
इस बयान को वैश्विक स्तर पर खासा महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि विकसित देश अक्सर व्यापारिक समझौतों में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को शामिल कर लेते हैं, जिससे विकासशील देशों को नुकसान होता है।
BRICS सम्मेलन का महत्व
BRICS (Brazil, Russia, India, China, South Africa) दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। यह मंच वैश्विक व्यापार, निवेश, विकास, ऊर्जा और भू-राजनीतिक मामलों पर विचार-विमर्श के लिए जाना जाता है।
- BRICS देशों की आबादी विश्व की लगभग 42% जनसंख्या को कवर करती है।
- यह समूह वैश्विक GDP का लगभग 30% हिस्सा है।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश में इनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
ऐसे में BRICS बैठक में दिए गए बयानों को अंतरराष्ट्रीय नीतियों के संदर्भ में काफी गंभीरता से देखा जाता है।
जयशंकर का बयान: क्या कहा विदेश मंत्री ने?
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सम्मेलन में कहा:
“व्यापारिक नीतियों को गैर-व्यापारिक मामलों से जोड़ना अनुचित है। विकसित देश अक्सर पर्यावरण और मानवाधिकार जैसे मुद्दों का हवाला देकर व्यापार में रुकावट डालते हैं। यह न केवल अनुचित है, बल्कि विकासशील देशों की प्रगति में बाधा डालता है।”
उनका यह बयान भारत की दीर्घकालिक नीति को दर्शाता है, जिसमें निष्पक्ष व्यापार (Fair Trade) और विकास पर केंद्रित सहयोग को प्राथमिकता दी जाती है।
विकसित देशों पर भारत का अप्रत्यक्ष निशाना
जयशंकर का यह बयान भले ही सीधे तौर पर किसी देश का नाम नहीं लेता, लेकिन यह साफ है कि इशारा अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर है।
- ये देश कई बार कार्बन उत्सर्जन, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मानकों के नाम पर व्यापारिक समझौतों में शर्तें जोड़ते हैं।
- विकासशील देशों को लगता है कि ऐसी शर्तें विकास की राह में बाधा बनती हैं।
- भारत सहित कई देश मानते हैं कि पर्यावरण और मानवाधिकार जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन्हें व्यापारिक नीतियों का हिस्सा बनाना अनुचित है।
भारत की स्थिति और रणनीति
भारत हमेशा से निष्पक्ष व्यापार का पक्षधर रहा है।
- भारत का मानना है कि वैश्विक व्यापार का उद्देश्य विकास होना चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव का उपकरण।
- भारत अपने मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के जरिए घरेलू उद्योगों को मजबूत कर रहा है।
- ऐसे में भारत नहीं चाहता कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी अतिरिक्त दबाव या शर्तें उसकी अर्थव्यवस्था पर असर डालें।
BRICS देशों की साझा चिंता
भारत के अलावा BRICS के अन्य सदस्य देशों की भी यही चिंता है।
- रूस पर अमेरिका और यूरोप ने कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है।
- चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध पहले ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल चुका है।
- दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी विकसित देशों की शर्तों से परेशान रहते हैं।
इसलिए, BRICS देशों के लिए यह मुद्दा साझा चिंता का विषय है।
वैश्विक प्रतिक्रिया
जयशंकर के बयान पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं।
- विकासशील देश भारत की इस स्थिति का समर्थन कर रहे हैं।
- वहीं, विकसित देश मानते हैं कि व्यापार समझौतों में पर्यावरण और मानवाधिकार जैसे मुद्दों को शामिल करना जरूरी है।
भविष्य की राह
भारत के इस बयान से साफ है कि आने वाले समय में भारत और अन्य BRICS देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में निष्पक्षता और पारदर्शिता की मांग को और तेज़ करेंगे।
- संभव है कि BRICS एक साझा मंच से नए व्यापार नियमों का प्रस्ताव रखे।
- भारत का प्रयास रहेगा कि वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की आवाज बुलंद की जाए।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर का BRICS सम्मेलन में दिया गया बयान भारत की मजबूत कूटनीतिक स्थिति को दर्शाता है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि व्यापार और राजनीति को मिलाना उचित नहीं है। यह न केवल भारत बल्कि सभी विकासशील देशों के हित में है।
BRICS सम्मेलन से यह संदेश गया है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अब वैश्विक व्यापार और नीतियों में अपनी सशक्त भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।




