नई दिल्ली, 25 मार्च 2026: सुप्रीम कोर्ट द्वारा पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) की अनुमति पाने वाले भारत के पहले व्यक्ति हरीश राणा का आज AIIMS दिल्ली में निधन हो गया। वे पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे। उनका यह मामला देश के कानूनी और नैतिक इतिहास में एक मील का पत्थर है।
कौन थे हरीश राणा?
हरीश राणा एक सामान्य परिवार से थे जो एक दुर्घटना के बाद कोमा में चले गए थे। उनका परिवार उनकी देखभाल करते-करते थक गया था और उन्हें देखना बेहद कष्टकारी था। परिवार ने जब देखा कि हरीश के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी।
पैसिव यूथेनेशिया क्या है?
पैसिव यूथेनेशिया वह प्रक्रिया है जिसमें किसी गंभीर रूप से बीमार या कोमा में पड़े व्यक्ति के जीवन-रक्षक उपकरणों को हटा दिया जाता है और उन्हें स्वाभाविक मृत्यु की ओर जाने दिया जाता है। यह सक्रिय यूथेनेशिया से अलग है, जिसमें कोई सक्रिय कदम उठाकर मृत्यु को त्वरित किया जाता है। भारत में पैसिव यूथेनेशिया को सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कुछ शर्तों के साथ वैध माना था।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा के परिवार की अपील पर सुनवाई करते हुए उनके लिए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी। यह भारत में किसी व्यक्ति विशेष के लिए दी गई पहली ऐसी अनुमति थी। अदालत ने कहा था कि मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है जितना गरिमा के साथ मृत्यु का।
13 साल का लंबा संघर्ष
हरीश राणा के परिवार ने पिछले 13 वर्षों में अपने प्रियजन को कोमा में देखा। इस दौरान उनके परिवार ने न केवल आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया बल्कि भावनात्मक रूप से भी टूटते रहे। उनकी माँ ने कहा था, “हम उसे इस हालत में नहीं देख सकते। वह खुद भी यही चाहते, कि उन्हें शांति मिले।”
AIIMS में हुआ अंतिम सांस
AIIMS दिल्ली में चिकित्सकों की एक विशेष टीम की निगरानी में, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए हरीश राणा के जीवन-रक्षक उपकरणों को धीरे-धीरे हटाया गया। आज उन्होंने अंतिम सांस ली। परिवार ने राहत और दुख का मिश्रित भाव व्यक्त किया।
इच्छा-मृत्यु की बहस – भारत में क्या है स्थिति?
भारत में इच्छा-मृत्यु का मुद्दा हमेशा से विवादास्पद रहा है। धार्मिक, नैतिक और कानूनी दृष्टिकोण से इस पर अलग-अलग मत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में “लिविंग विल” की अवधारणा को मान्यता दी थी, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपने जीवित रहते यह घोषित कर सकता है कि यदि वह कोमा में चला जाए, तो उसे कृत्रिम जीवन-रक्षण प्रणाली पर नहीं रखा जाए।
समाज और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
हरीश राणा के निधन पर देश भर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। चिकित्सकों का एक वर्ग मानता है कि पैसिव यूथेनेशिया मानवीय गरिमा का सम्मान है। वहीं, धार्मिक संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे एक ऐतिहासिक पल बताया।
कानूनी महत्व और भविष्य
हरीश राणा का यह मामला भारतीय कानून के इतिहास में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बना। आने वाले समय में इस फैसले का उपयोग अन्य समान मामलों में भी किया जाएगा। भारत सरकार पर दबाव है कि वह पैसिव यूथेनेशिया और लिविंग विल पर एक स्पष्ट कानून बनाए।
निष्कर्ष
हरीश राणा का निधन भारत के न्यायिक और सामाजिक इतिहास में एक अध्याय का अंत है। यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जीवन और मृत्यु के बीच गरिमा कहाँ है। HRAC News इस संवेदनशील मुद्दे पर लगातार रिपोर्टिंग करता रहेगा।
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