🏛️ NCERT किताब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अवमानना नोटिस जारी
हाल ही में कक्षा 8 की एक पुस्तक को लेकर देश में नया विवाद खड़ा हो गया है। मामला तब गरमाया जब Supreme Court of India ने कक्षा 8 की National Council of Educational Research and Training (NCERT) की एक किताब में न्यायपालिका के खिलाफ की गई कथित टिप्पणियों पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया।
🔎 क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट्स के अनुसार, कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान/नागरिक शास्त्र की पुस्तक में न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और कुछ फैसलों पर ऐसी टिप्पणियां दर्ज थीं, जिन्हें अदालत ने “अनुचित” और “संविधानिक संस्थाओं की गरिमा के प्रतिकूल” माना।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप करते हुए केंद्र सरकार के शिक्षा सचिव और NCERT के निदेशक को अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है कि ऐसी सामग्री को प्रकाशित करने से पहले उचित समीक्षा क्यों नहीं की गई।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति क्या है?
अदालत का मानना है कि:
- पाठ्यपुस्तकों में दी गई सामग्री तथ्यात्मक, संतुलित और संविधानसम्मत होनी चाहिए।
- न्यायपालिका जैसी संवैधानिक संस्था पर टिप्पणी करते समय भाषा और संदर्भ अत्यंत सावधानीपूर्ण होना चाहिए।
- छात्रों के मन में किसी भी संस्था के प्रति गलत या नकारात्मक धारणा नहीं बननी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है, लेकिन यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए।
📚 शिक्षा व्यवस्था पर असर
यह मामला केवल एक किताब तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था में सामग्री की समीक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- पाठ्यपुस्तकों की सामग्री को प्रकाशित करने से पहले बहु-स्तरीय समीक्षा (Multi-layer review) होनी चाहिए।
- संवेदनशील विषयों पर विशेषज्ञों की समिति द्वारा अनुमोदन अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- छात्रों को आलोचनात्मक सोच सिखाई जाए, लेकिन तथ्यों के आधार पर।
🏛️ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) का क्या अर्थ है?
जब अदालत बिना किसी औपचारिक याचिका के, स्वयं किसी मुद्दे पर संज्ञान लेती है, तो उसे स्वतः संज्ञान कहा जाता है। यह तब किया जाता है जब मामला जनहित, संविधान या संस्थागत गरिमा से जुड़ा हो।
🔔 अवमानना नोटिस का मतलब
“कारण बताओ नोटिस” का अर्थ है कि संबंधित अधिकारियों को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए।
यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो अदालत आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
🗣️ राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
मामले के सामने आने के बाद:
- कुछ शिक्षा विशेषज्ञों ने इसे पाठ्यक्रम सुधार का अवसर बताया।
- वहीं कुछ संगठनों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा।
- राजनीतिक हलकों में भी इस पर बहस तेज हो गई है।
📌 आगे क्या?
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई पर है। यदि अदालत को जवाब संतोषजनक नहीं लगता, तो:
- किताब की सामग्री में संशोधन का आदेश दिया जा सकता है।
- संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है।
- भविष्य में पाठ्यपुस्तक प्रकाशन के लिए सख्त दिशानिर्देश तय किए जा सकते हैं।
✍️ निष्कर्ष
यह मामला केवल एक किताब या एक टिप्पणी तक सीमित नहीं है। यह शिक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के बीच संतुलन का प्रश्न बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम संकेत देता है कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था अपनी गरिमा और संविधान के मूल्यों की रक्षा के प्रति सजग है। अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग और NCERT इस पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं और आगे क्या सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं।








