भारत के राजनीतिक और ऐतिहासिक प्रतीकों से जुड़ा एक बड़ा निर्णय सामने आया है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम Mann Ki Baat में घोषणा की कि Rashtrapati Bhavan में स्थापित ब्रिटिश वास्तुकार Edwin Lutyens की प्रतिमा को हटाया जाएगा और उसकी जगह स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल C. Rajagopalachari की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
सरकार का यह निर्णय भारत के औपनिवेशिक प्रतीकों से दूरी बनाने और भारतीय महान नेताओं को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पीएम मोदी की घोषणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत अब गुलामी के प्रतीकों को पीछे छोड़ते हुए भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता के बाद भी राष्ट्रपति भवन जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर ब्रिटिश अधिकारियों और व्यक्तियों की प्रतिमाएं मौजूद थीं, जबकि भारत के महान नेताओं को वह स्थान नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था।
इसी कारण सरकार ने निर्णय लिया है कि ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा हटाकर सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।
कौन थे एडविन लुटियंस
एडविन लुटियंस एक प्रसिद्ध ब्रिटिश वास्तुकार थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासनकाल के दौरान नई दिल्ली के कई महत्वपूर्ण भवनों की डिजाइन तैयार की थी।
उन्होंने राष्ट्रपति भवन (तत्कालीन वायसराय हाउस), इंडिया गेट और कई प्रशासनिक भवनों का डिजाइन बनाया था।
नई दिल्ली के एक बड़े इलाके को आज भी “लुटियंस दिल्ली” कहा जाता है, जो उनके वास्तु योगदान का प्रतीक है।
हालांकि उनका योगदान वास्तुकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन उनकी प्रतिमा राष्ट्रपति भवन में होना कई लोगों के लिए औपनिवेशिक दौर की याद दिलाता था।
कौन थे सी. राजगोपालाचारी
सी. राजगोपालाचारी, जिन्हें राजाजी के नाम से भी जाना जाता है, स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल थे।
उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी रहे।
वे एक महान विचारक, प्रशासक और स्वतंत्रता सेनानी थे। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें ऐसा नेता बताया जिसने सत्ता को पद नहीं बल्कि सेवा माना।
उनकी प्रतिमा लगाने का उद्देश्य भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय विरासत को सम्मान देना है।
राष्ट्रपति भवन में क्या बदलेगा
सरकारी योजना के अनुसार:
- लुटियंस की प्रतिमा हटाई जाएगी
- राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगाई जाएगी
- राष्ट्रपति भवन परिसर में स्थापना होगी
- कार्यक्रम के दौरान विशेष आयोजन भी होगा
राजगोपालाचारी की प्रतिमा राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय प्रांगण में स्थापित की जाएगी।
औपनिवेशिक प्रतीकों से दूरी
यह निर्णय केवल एक प्रतिमा बदलने का मामला नहीं है, बल्कि इसे एक व्यापक सांस्कृतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार पहले भी कई कदम उठा चुकी है जिनका उद्देश्य औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति बताई जाती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार कहा है कि भारत को गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए।
राष्ट्रपति भवन में यह बदलाव उसी दिशा में एक प्रतीकात्मक कदम माना जा रहा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
यह निर्णय कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है:
1. ऐतिहासिक महत्व
यह स्वतंत्र भारत के इतिहास को प्रमुखता देने का प्रयास है।
2. सांस्कृतिक पहचान
भारतीय नेताओं को राष्ट्रीय संस्थानों में सम्मान मिलना देश की पहचान को मजबूत करता है।
3. प्रतीकात्मक बदलाव
औपनिवेशिक प्रतीकों से दूरी बनाने का संदेश जाता है।
लोगों की प्रतिक्रिया
इस निर्णय को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
कुछ लोग इसे भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला कदम बता रहे हैं।
वहीं कुछ लोग मानते हैं कि लुटियंस का वास्तु योगदान भी ऐतिहासिक महत्व रखता है।
हालांकि सरकार का कहना है कि यह बदलाव भारतीय विरासत को सम्मान देने के लिए किया जा रहा है।
राजाजी उत्सव का आयोजन
राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापना के अवसर पर “राजाजी उत्सव” आयोजित किया जाएगा।
इस दौरान एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी जिसमें राजगोपालाचारी के जीवन और योगदान को प्रदर्शित किया जाएगा।
निष्कर्ष
राष्ट्रपति भवन में लुटियंस की प्रतिमा हटाकर राजगोपालाचारी की प्रतिमा लगाना भारत के इतिहास और पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय है।
यह कदम औपनिवेशिक दौर से आगे बढ़ते हुए स्वतंत्र भारत के महान नेताओं को सम्मान देने की दिशा में देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस घोषणा ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि भारत अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आने वाले समय में ऐसे और बदलाव देखने को मिल सकते हैं जो भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय गौरव को उजागर करेंगे।








